Communism in India: Destined for Failure?

What image comes to your mind when you think of an Indian Communist? Most of you might visualise a man at least in his sixties, in a white kurta, wearing glasses with an unconvincing smile on his face. He seems to be giving a speech in front of an oldish microphone, shouting ideological jargon- words like “revolution” and “cholbe na” being commonly uttered.

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भारत में जनसंख्या को ले कर चलने वाली बहस यूरोप की ग़ुलाम क्यों है ?

खबर आई कि लोकसभा में जनसंख्या बिल पेश होने वाला है । इस पर भारत में लम्बी बहस हुई है । अगर आप ग़ौर से देखेंगे तो भारत में यह बहस दो तरह के दबावों की वजह से चलती है । पहला दबाव भारत के धुर हिंदुत्ववादी खेमे का है ,जिसे लगता है कि ‘मुसलमान सुनुयोजित तरीक़े से भारत में जनसांख्यकीय बदलाव करना चाहते हैं । दूसरा दबाव , उदारवादियों का है , जिन्हें उन बहुसंख्यक सांप्रदायिकों से शिकायत रहती है कि ये लोग ‘दस बच्चे’ पैदा करने की अवैज्ञानिक वकालत ‘रिएक्शन’ ’ में क्यों कर रहे हैं । एक तीसरा खेमा है , जो संख्या में ज़रूर छोटा है ,पर उसकी चिंता प्रकृति से सीमित संख्या में मिले संसाधनों से जुड़ी है । ज़्यादा संख्या में बढ़ते हुए लोग नेचर का इतना दोहन करेंगे कि संसाधनो की कमी के नए संकट पैदा हो जाएँगे । इसका परिणाम होगा – निचला जीवन स्तर ,युद्ध और भुखमरी- यह तीसरे खेमे की चिंता है ।

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सालाबेग- युद्ध से भक्ति तक

लेखक – अदनान भक्ति को सर्वोपरि माना जाता है । यह भावना जाति, लिंग, आयु, धर्म की मानव निर्मित सभी सीमाओं को पार कर जाती है। आज हम आपके लिए भगवान जगन्नाथ के एक महान भक्त की कहानी बताना चाहते हैं । वह भले ही अलग धर्म में पैदा हुए थे लेकिन उनकी भावनाओं और […]

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हम सब इतने आधे -अधूरे और बेचैन क्यों हैं?

भारतीय जीवन क्या सच में अब निराश नहीं है? धूप में घुटते हुए, रोज़मर्रा के जीवन को ढोते हुए, एक दैनिक क्रम के दोहराव में,क्याकभी नहीं लगता कि हमने कुछ मिस कर दिया है। हज़ार तरक़्क़ी के बावजूद ड्रग्स में मुक्ति खोजती आँखे क्या विवश नहीं हैं? क्या कोईध्येय है जो जीवन की इन निराशाओं से उबार सकता था? हमें कुछ होने के एक सुकून भरे स्वप्न में जीवित रख सकता था? क्यों हमारेख़्वाब इतने मटमैले हैं कि उनकी मोक्ष सिर्फ़ चेतना से दूर होती शामों में , ख़ुद को भुलाकर हम खोजते रहते हैं?

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Where is gender in political discussions?

There are many ways in which gender disparity manifests itself, including social stereotyping, domestic and societal violence, gender pay gaps, etc. It is not surprising that a large segment of our society experiences unequal or disadvantageous treatment based on gender. Considering the multilayered nature of Indian society, which includes class, caste, and urban and rural divides, the inequality and abuse women face differ due to their intersection with two or more of these factors. While Beti Bachao, Beti Padhao and many other schemes have surfaced to empower women in India, the big question I still feel is whether men in politics are ready to share the power with women?

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Machiavellianism: An adjective?

“A prince cannot observe all those things for which men are considered good, for in order to maintain the state he is often obliged to act against his promise, against charity, against humanity, and against religion”- This is one of the famous quotes written by Niccolò Machiavelli in his book “The Prince”. The Prince is a short treatise that tells how to acquire power, create a state and keep it. This book represents Machiavelli’s effort to provide a guide for political action based on the lessons of history and his own experience as a foreign secretary in Florence. He used to believe that politics has its own rules which shocked his readers that the adjectival form of his surname, Machiavellian, came to be used as a synonym for political maneuvers marked by cunning, duplicity, or bad faith.

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कर्पूरी ठाकुर – एक जननायक

24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर जिले के पितोंझिया गाँव में एक लड़के का जन्म हुआ नाम रखा गया कर्पूरी ठाकुर। जाति से नाई कर्पूरी ठाकुर पढाई में तेज़ थे और साथ ही राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित थे जिसके चलते उन्होंने अखिल भारतीय छात्र संघ की सदस्यता ली और भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया।

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अपनी-अपनी पुलिस, अपने-अपने पत्रकार…जैसी सरकार वैसे ‘थानेदार’

यूपी में मिड-डे मील की स्टोरी करने पर पत्रकार को डीएम की शिकायत पर जेल भेज दिया गया था। यूपी के बलिया में बोर्ड परीक्षाओं का पर्चा लीक करने की खबर चलाने पर 3 पत्रकारों को प्रशासन ने जेल भेज दिया था। जाने माने पत्रकार और फैक्ट चेकर मोहम्मद ज़ुबैर को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और यूपी के सीतापुर पूछताछ के लिए लेकर गई। टीवी पत्रकार अमन चोपड़ा पर राजस्थान में मामला दर्ज किया गया। इससे पहले पत्रकार अर्णब गोस्वामी को महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भेजा था। आपको याद होगा कि दिवंगत पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ हिमाचल में केस दर्ज हुआ था और उन्हें अगले दिन हिमाचल में कोर्ट के सामने पेश होने का समन जारी किया गया था। अब पत्रकार रोहित रंजन का मामला सामने आया है, जिसमें छत्तीसगढ़ पुलिस रायपुर में उन पर केस दर्ज किया और यूपी के गाजियाबाद में गिरफ्तार करने पहुंची थी।

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वह दार्शनिक ,जो राजा और सैनिकों की शादी के ख़िलाफ़ था

‘जब तक दार्शनिक , राजा नहीं बन जाते या राजा , दार्शनिकों में नहीं बदल जाते तब तक दुनिया से बुराइयां मिटना सम्भव नहीं है |’ यह यूनानी दार्शनिक प्लेटो का मानना था । प्लेटो राजनीतिक दर्शन की दुनिया के गॉडफादर हैं – दुनिया के पहले राजनीतिक दार्शनिक, जिनका लिखा हुआ हम पढ़ सकते हैं । एक ऐसा चिंतक जिसका मानना था कि साम्यवाद सिर्फ संपत्ति का ही नहीं पत्नियों का भी होना चाहिये । हालाँकि उनके इस सिद्धांत की सबसे जबरदस्त आलोचना उनके चेले अरस्तु ने ही की है। जानिये , प्लेटो के उन पांच सिद्धांतों के बारे में जिनकी चर्चा सिर्फ दर्शनशास्त्र पढने वालों के बीच सिमट कर रह जाती है ।

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कांग्रेस का साथ और नेशनल हेराल्ड, क्या है विवाद?

कुछ दिनों पहले कांग्रेस नेता और वायनाड से सांसद राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को प्रवर्तन निदेशालय ने समन जारी किया था । प्रवर्तन निदेशालय ने मनीलॉन्डरिंग निवारण कानून की आपराधिक धाराओं के तहत उनके बयान दर्ज किए ।यह जांच नेशनल हेराल्ड नामक ‘अखबार के ज़रिए हुई वित्तीय अनियमितताओं’ से जुड़ी है।यह मामला सबके सामने आया सन् 2012 में, जब भारतीय जनता पार्टी के नेता और वकील सुब्रमयणम स्वामी ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक शिकायत दर्ज करते हुये कांग्रेस नेताओ पर धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोप लगाये थे।

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