बेहाल बिहार

लेखक ज़ैद चौधरी

चाणक्य की नीति, आर्यभट्ट का आविष्कार

महावीर की तपस्या, बुद्ध का अवतार

सीता की भूमि, विद्यापति का संसार

जनक की नगरी, माँ गंगा का श्रंगार

चंद्रगुप्त का साहस, अशोक की तलवार

बिंदुसार का शासन, मगध का आकार

दिनकर की कविता, रेणु का सार

नालंदा का ज्ञान, पर्वत मन्धार

वाल्मिकी की रामायण, मिथिला का संस्कार

राजेन्द्र का सपना, गांधी की हुंकार कहाँ लुप्त हो गया है, वो सर्वश्रेष्ठ “बिहार

*प्रारम्भिक कविता कवि अभिषेक कुमार की पंक्तियों से प्रेरित हैं। 

जिन्होंने इतिहास पढ़ा है वो जानते है, बिहार के महत्व को। वो जानते हैं के एक समय में बिहार राज्य, देश के सबसे सर्वश्रेष्ठ राज्यों में शामिल था। यह जितना सत्य है, उतना ही सत्य है के आज बिहार बीमारू और सबसे पिछड़े राज्य के रूप में देखा जाता है। आज भी बिहार की आधी से अधिक जनता गरीबी रेखा के नीचे आती है। आज भी शिक्षा, सवास्थ्य , और रोज़गार के मामलों में बिहार अन्य राज्यों से काफी पीछे है। सड़क, बिजली, साफ़ पानी जैसी समस्याओं से बिहार आज भी झूझ रहा है।

सवाल यही उठता है की क्यों इतने दशकों में भी बिहार में साधारण सुविधाएं आम जनता तक अभी भी नहीं पहुंच पायी हैं। वह प्रदेश जिसका नाम विश्व में सबसे पहले बनने वाले विश्वविद्यालयों में शामिल है, जिसको गांधी के संघर्ष की धरती कहा जाता है, जहाँ से आज भी सबसे अधिक सिविल सर्वेन्ट्स निकलते हैं। वो राज्य विकसित राज्यों की सूची में सबसे निचले पायदान पर नज़र आता है। 

लालू, नितीश और कई अन्य बड़े प्रभावशाली नेताओं ने दशकों तक बिहार की सत्ता को चलाया है, पर क्या कारण है की, दशकों तक चालयी सरकार, फिर भी न बेहतर हुआ बिहार। यदि आंकड़ों को देखे तो साल 1967 तक बिहार भारत के सबसे अग्रणी व सुशासित राज्यों में गिना जाता था लेकिन 1967 से यानि जबसे बिहार में पिछड़ों की, जिसकी जितनी जनसंख्या में भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी की राजनीति करने वाले दलों का शासन हुआ बिहार पिछड़ता चला गया और पिछले 25-30 सालों से बिहार सबसे निचले पायदान पर शान से विराजमान है।

अब न चाणक्य है, न बिन्दुसार है, न राजेंद्र न कोई गाँधी का अवतार है। तो ये मान लिया जाए की बिहार में फिर से बहार नहीं आ सकती, हम मानले के बिहार के लोगों को सदैव ही सुविधाओं से वंचित रहना पड़ेगा। हम मानले के अब बिहार की समस्याओं का कोई समाधान नहीं है।

नमुमकिन कुछ भी नहीं, यदि ठान लिया जाए। पराजय तभी है जब मान लिया जाए। ऐसा कदापि नहीं है की बिहार में सुधार नहीं हो सकता। बिहार में शिक्षा, सवास्थ्य, रोज़गार, और साधारण सुविधाओं के स्तर को बेहतर किया जा सकता है। बस ज़रूरत है तो सही लोगों, सही सोच और सामूहिक प्रयास की। 

The views expressed in this article are those of the author and do not represent the stand of Youth in Politics.

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